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हैं सबसे मधुर वो गीत - Hain Sabse Madhur Wo Geet (Talat Mahmood, Patita)



Movie/Album: पतिता (1953)
Music By: शंकर-जयकिशन
Lyrics By: शैलेन्द्र
Performed By: तलत महमूद

हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें
हम दर्द के सुर में गाते हैं
जब हद से गुज़र जाती है खुशी
आँसू भी छलकते आते हैं
हैं सबसे मधुर...

काँटों में खिले हैं फूल हमारे
रंग भरे अरमानों के
नादान हैं जो इन काँटों से
दामन को बचाये जाते हैं
हैं सबसे मधुर...

जब ग़म का अन्धेरा घिर आये
समझो के सवेरा दूर नहीं
हर रात का है पैगाम यही
तारे भी यही दोहराते हैं
हैं सबसे मधुर...

पहलू में पराये दर्द बसा के
(तू) हँसना हँसाना सीख ज़रा
तूफ़ान से कह दे घिर के उठे
हम प्यार के दीप जलाते हैं
हैं सबसे मधुर...


भरम तेरी वफ़ाओं का - Bharam Teri Wafaon Ka (Talat Mahmood, Armaan)



Movie/Album: अरमान (1953)
Music By:
एस.डी.बर्मन
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: तलत महमूद

भरम तेरी वफ़ाओं का मिटा देते
तो क्या होता
तेरे चेहरे से हम पर्दा उठा देते
तो क्या होता

मोहब्बत भी तिजारत हो गई है
इस ज़माने में
अगर यह राज़ दुनिया को बता देते
तो क्या होता

तेरी उम्मीद पर जी लेते
हासिल कुछ नहीं लेकिन
अगर यूं भी ना दिल को आसरा देते
तो क्या होता


अंधे जहान के अंधे रास्ते - Andhe Jahan Ke Andhe Raste (Talat Mahmood, Patita)



Movie/Album: पतिता (1953)
Music By: शंकर-जयकिशन
Lyrics By: शैलेन्द्र
Performed By: तलत महमूद

अंधे जहान के अंधे रास्ते
जाएँ तो जाएँ कहाँ
दुनिया तो दुनिया, तू भी पराया
हम यहाँ ना वहाँ

जीने की चाहत नहीं, मर के भी राहत नहीं
इस पार आँसू, उस पार आहें, दिल मेरा बेज़ुबां
अंधे जहान के अंधे...

हम को न कोई बुलाए, ना कोई पलकें बिछाए
ऐ ग़म के मारों, मंज़िल वहीं है, दम ये टूटे जहाँ
अंधे जहान के अंधे...

आग़ाज़ के दिन तेरा, अंजाम तय हो चुका
जलते रहे हैं, जलते रहेंगे, ये ज़मीं आसमां
अंधे जहान के अंधे...


शाम-ए-ग़म की कसम - Shaam-e-Gham Ki Kasam (Talat Mahmood, Footpath)



Movie/Album: फुटपाथ (1953)
Music By: खय्याम
Lyrics By: मजरूह सुल्तानपुरी
Performed By: तलत महमूद

शाम-ए-ग़म की कसम
आज ग़मगीं हैं हम
आ भी जा, आ भी जा, आज मेरे सनम
शाम-ए-ग़म की कसम

दिल परेशान है, रात वीरान है
देख जा, किस तरह आज तन्हाँ हैं हम
शाम-ए-ग़म की कसम

चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं
मार डाले न दर्द-ए-जुदाई कहीं
रुत हसीं  है तो क्या, चांदनी है तो क्या
चांदनी ज़ुल्म है और जुदाई सितम
शाम-ए-ग़म की कसम...

अब तो आजा के अब रात भी सो गई
ज़िन्दगी ग़म के सहराओं में खो गई
ढूंढती है नज़र, तू कहाँ है मगर
देखते देखते आया आँखों में दम
शाम-ए-ग़म की कसम...


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