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मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे - Murga Murgi Pyar Se Dekhe (Lata Mangeshkar, Do Kaliyan)



Movie/Album: दो कलियाँ (1968)
Music By: रवि
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: लता मंगेशकर

मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे, नन्हाँ चूज़ा खेल करे
मैं किसको बोलूँ जो मेरे मात-पिता का मेल करे
मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे...

चिड़िया ओर चिड़ा मिलजुल कर दाना-दुनका लाये
अपने छोटे से बच्चे को खोल के चोंच खिलाये
मैं जब अपने भाग को सोचूँ, आँख में आँसू आये
मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे...

साथ के घर का नन्हाँ बच्चा, मात-पिता संग खेले
मेरा बचपन मात-पिता की दूरी का दुःख झेले
कोई मुझे वैसा घर दे दे, महल दो-महलें ले ले
मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे...

बड़ों के आगे बात करें, ये हम बच्चों का काम नहीं
जब तक उनका मन न पिघले, अपने लिए आराम नहीं
उस घर में क्या रहना, जिसमें सीता के संग राम नहीं
मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे...


बच्चे मन के सच्चे - Bachche Man Ke Sachche (Lata Mangeshkar, Do Kaliyan)



Movie/Album: दो कलियाँ (1968)
Music By: रवि
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: लता मंगेशकर

बच्चे मन के सच्चे
सारे जग की आँख के तारे
ये वो नन्हें फूल हैं जो
भगवान को लगते प्यारे
बच्चे मन के सच्चे...

खुद रूठे, खुद मन जायें, फिर हमजोली बन जायें
झगड़ा जिसके साथ करे, अगले ही पल फिर बात करे
इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिए कोई ग़ैर नहीं
इनका भोलापन मिलता है सबको बाँह पसारे
बच्चे मन के सच्चे...

इन्साँ जब तक बच्चा है, तब तक समझो सच्चा है
ज्यूँ-ज्यूँ उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ का मैल चढ़े
क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे, लालच की आदत घेरे
बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे
बच्चे मन के सच्चे...

तन कोमल, मन सुन्दर है, बच्चे बड़ों से बेहतर हैं
इनमें छूत और छात नहीं, झूठी ज़ात और पात नहीं
भाषा की तकरार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं
इनकी नज़रों में एक है, मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे
बच्चे मन के सच्चे...


तुम्हारी नज़र क्यूँ खफ़ा - Tumhari Nazar Kyun Khafa (Lata Mangeshkar, Md.Rafi, Do Kaliyan)



Movie/Album: दो कलियाँ (1968)
Music By: रवि
Lyrics By: साहिर लुधियानवी
Performed By: लता मंगेशकर, मो.रफ़ी

तुम्हारी नज़र क्यूँ खफ़ा हो गई
खता बख्श दो गर खता हो गई
हमारा इरादा तो कुछ भी ना था
तुम्हारी खता खुद सज़ा हो गई

सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है
सज़ा में भी इक प्यार का सिलसिला है
मोहब्बत का अब कुछ भी अंजाम हो
मुलाकात की इफ्तिदा हो गई
तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा...

मुलाकात पर इतने मगरूर क्यों हो
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो
मनाने की आदत कहाँ पड़ गई
सताने की तालीम क्या हो गई
तुम्हारी नज़र क्यूँ खफ़ा...

सताते ना हम तो मनाते ही कैसे
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे
इसी दिन का चाहत को अरमान था
क़ुबूल आज दिल की दुआ हो गई
तुम्हारी नज़र क्यूँ खफ़ा...

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तुम्हारी नज़र क्यूँ खफ़ा हो गई
खता बख्श दो गर खता हो गई
हमारा इरादा तो कुछ भी ना था
तुम्हारी खता खुद सज़ा हो गई

सज़ा कुछ भी दो पर खता तो बता दो
मेरी बेगुनाही का कुछ तो सिला दो
मेरे दिल के मालिक मेरे देवता
बस अब ज़ुल्म की इन्तेहा हो गई
हमारा इरादा तो...


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