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माँ - Maa (Shankar Mahadevan, Taare Zameen Par)



Movie/Album: तारे ज़मीन पर (2007)
Music By: शंकर एहसान लॉय
Lyrics By: प्रसून जोशी
Performed By: शंकर महादेवन

मैं कभी बतलाता नहीं
पर अंधेरे से डरता हूँ मैं माँ

यूँ तो मैं, दिखलाता नहीं
तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ
तुझे सब है पता, है ना माँ
तुझे सब है पता, मेरी माँ

भीड़ में, यूँ ना छोड़ो मुझे
घर लौट के भी आ ना पाऊँ माँ   
भेज ना इतना दूर मुझको तू
याद भी तुझको आ ना पाऊँ माँ
क्या इतना बुरा हूँ मैं माँ
क्या इतना बुरा मेरी माँ

जब भी कभी पापा मुझे
जो ज़ोर से झूला झुलाते हैं माँ
मेरी नज़र ढूँढे तुझे
सोचूं यही तू आ के थामेगी माँ

उनसे मैं ये कहता नहीं
पर मैं सहम जाता हूँ माँ
चेहरे पे आने देता नहीं
दिल ही दिल में घबराता हूँ माँ
तुझे सब है पता है ना माँ
तुझे सब है पता मेरी माँ
मैं कभी बतलता नहीं...


तारे ज़मीं पर - Taare Zameen Par (Shankar Mahadevan)



Movie/Album: तारे ज़मीन पर (2007)
Music By: शंकर एहसान लॉय
Lyrics By: प्रसून जोशी
Performed By: शंकर महादेवन, डोमिनिक सेरेजो, विविएने पोचा

देखो इन्हें ये हैं ओस की बूँदें
पत्तों की गोद में आसमां से कूदे
अंगड़ाई लें फिर करवट बदल कर
नाज़ुक से मोती हंस दे फिसल कर
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर

ये तो हैं सर्दी में धूप की किरणें
उतरें जो आँगन को सुनहरा सा करने
मन के अंधेरो को रोशन सा कर दें
ठिठुरती हथेली की रंगत बदल दें
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर

जैसे आँखों की डिबिया में निंदिया
और निंदिया में मीठा सा सपना
और सपने में मिल जाए फरिश्ता सा कोई
जैसे रंगों भरी पिचकारी
जैसे तितलियाँ फूलों की क्यारी
जैसे बिना मतलब का प्यारा रिश्ता हो कोई

ये तो आशा की लहर हैं
ये तो उम्मीद की सहर हैं
खुशियों की नहर हैं
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर

देखो रातों के सीने पे ये तो
झिलमिल किसी लौ से उगे हैं
ये तो अंबियो की खुश्बू हैं
बागों से बह चले
जैसे काँच में चूड़ी के टुकड़े
जैसे खिले खिले फूलों के मुखड़े
जैसे बंसी कोई बजाए पेड़ों के तले

ये तो झोंके हैं पवन के
हैं ये घुंघरू जीवन के
ये तो सुर हैं चमन के
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर

मुहल्ले की रौनक गलियाँ हैं जैसे
खिलने की ज़िद पर कलियाँ हैं जैसे
मुट्ठी में मौसम की जैसे हवायें
ये हैं बुज़ुर्गों के दिल की दुआएं
खो ना जाएँ ये तारे ज़मीं पर

कभी बातें जैसे दादी नानी
कभी चले जैसे मम मम पानी
कभी बन जाएँ भोले सवालों की झड़ी
सन्नाटे में हँसी के जैसे
सूने होठों पे खुशी के जैसे
ये तो नूर हैं बरसे गर
तेरी किस्मत हो बड़ी

जैसे झील में लहराए चंदा
जैसे भीड़ में अपने का कंधा
जैसे मनमौजी नदिया
झाग उड़ाए कुछ कहे
जैसे बैठे बैठे मीठी सी झपकी
जैसे प्यार की धीमी सी थपकी
जैसे कानों में सरगम
हरदम बजती ही रहे
जैसे बरखा उडाती है निंदिया...


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